tag:blogger.com,1999:blog-32145305.post8656099143841444564..comments2007-12-31T15:45:00.726-08:00Comments on समन्वय ....: हमारी समझ का घूमता आईनाdeepakhttp://www.blogger.com/profile/10093871274029021366noreply@blogger.comBlogger4125tag:blogger.com,1999:blog-32145305.post-44912929511583357082007-12-31T15:45:00.000-08:002007-12-31T15:45:00.000-08:00दीपक साहबअब कम से कम इस साल तो लिखते रहिये.दीपक साहब<BR/>अब कम से कम इस साल तो लिखते रहिये.Anonymousnoreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-32145305.post-52683022888269494392007-10-26T21:44:00.000-07:002007-10-26T21:44:00.000-07:00I really liked ur post, thanks for sharing. Keep w...I really liked ur post, thanks for sharing. Keep writing. I discovered a good site for bloggers check out this www.blogadda.com, you can submit your blog there, you can get more auidence.Kiranhttp://www.blogger.com/profile/18358999795897270357noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-32145305.post-66008637346899379892007-04-11T20:18:00.000-07:002007-04-11T20:18:00.000-07:00जो थोड़ी-बहुत दुनिया अभी तक देख-समझ पायी हूँ उसके आ...जो थोड़ी-बहुत दुनिया अभी तक देख-समझ पायी हूँ उसके आधार पर कहूँगी की कैलेंडर वाली स्त्री निठारी वाली स्त्री से भी अधिक खो चुकी है, अन्दर ही अन्दर! और यदि आधुनिक बनने की होड़ में वो इस सत्य को स्वीकारने की हिम्मत ना जुटा पाये, जिसकी की आशंका अधिक है, तो इसमे भी कोई आश्चर्य नही। कैलेंडर वाली स्त्री ने तो दिखावे की दुनिया में पल-पल आत्मसम्मान रुपी संतान खोयी, और निथारी वाली स्त्री की तरह वो किसी से अपनी करुना भी ना बाँट पायी। मॅन ही मॅन घुट रही है और ऊपर ही ऊपर दिखावटी मुस्कान लिए कैलेंडर के लिए पोज़ दे रही है, संतान्विहीन होते हुए भी, संतान को खोने समान दुःख लेकर। अब ये बात तो स्वयं से ही पूछ्नी होगी की उसकी संतान भी क्या कोई मोहिंदर चुरा ले गया?shweta sirohi guptahttp://www.blogger.com/profile/01511895275321173035noreply@blogger.comtag:blogger.com,1999:blog-32145305.post-14975184492808087372007-02-04T02:05:00.000-08:002007-02-04T02:05:00.000-08:00स्त्री को बीकीनी में स्वीकारने में कठीनाई क्यों हो...स्त्री को बीकीनी में स्वीकारने में कठीनाई क्यों होती है, यह समझ से बाहर है. मानो सारी सभ्यता कपड़ो में सिमट कर रह गई है.<br />गंगा तट पर टुबकी लगाने भागते भूत(जैसे)जैसे लोग (संत) किस सभ्यता की उपज है?<br />याद रखिये भारत का वह स्वर्णकाल था जब स्त्रीओं पर वस्त्रो को लेकर कोई प्रतिबन्ध नहीं था. कमर से उपर कपड़े पहनने अनिवार्य नहीं थे. तब हम सबसे सभ्य थे.संजय बेंगाणीhttp://www.blogger.com/profile/07302297507492945366noreply@blogger.com